परमात्मा का परिचय
परमात्मा कितने हैं? परमात्मा का नाम व रूप क्या है?
परमात्मा एक ही है। परमात्मा का नाम है, सदाशिव। सदा माना हमेशा, व शिव माना कल्याणकारी।
क्योंकि परमात्मा सारी सृष्टि का सद्गति दाता है। इसलिए वह कल्याणकारी है। पुनर्जन्म के चक्कर से सदा मुक्त परमात्मा का नाम कभी भी नहीं बदलता। इसलिए उन्हें सदाशिव कहते हैं। परमात्मा शिव ज्योति बिंदु स्वरूप है। यानी तेज प्रकाश का एक बिंदु। उनका कोई शारीरिक आकार नहीं है, इसलिए उन्हें निराकार कहा जाता है। शिवलिंग परमात्मा का यादगार चिन्ह है। लिंग का अर्थ है, चिन्ह अथवा प्रतिमा।
शिवलिंग यानी कल्याणकारी परमपिता परमात्मा की प्रतिमा। संसार में सभी मूर्तियों में सर्वाधिक पूजा शायद शिवलिंग की ही होती है।
परमात्मा कहां के रहने वाले हैं?
सूर्य, चंद्रमा, सितारों से भी दूर जहां वैज्ञानिक साधन भी नहीं पहुंच सकते--- सुनहरे प्रकाश से भरा एक स्थान जिसे परमधाम या शांति धाम कहते हैं। वहां परमात्मा शिव निवास करते हैं।
परमात्मा का क्या कर्तव्य है?
एक सत धर्म की स्थापना। धर्म स्थापना के लिए परमात्मा शिव अपने शाश्वत निवास परमधाम से इस धरा पर अवतरित होते हैं। कलयुग के अंत में जब अधर्म अति में पहुंच जाता है। तब परमपिता परमात्मा एक कर्मभ्रष्ट व धर्मभ्रष्ट संसार का उद्धार करने के लिए ब्रह्मलोक से नीचे उतरकर एक साधारण मनुष्य के तन में प्रवेश करते हैं। वह उसके मुख द्वारा सहज ज्ञान वह राजयोग की शिक्षा देते हैं। वर्तमान समय में लोग एक भयभीत जीवन जी रहे हैं। प्राकृतिक आपदाओं को भय की दृष्टि से देखा जा रहा है। पारिवारिक रिश्तों में स्वार्थ बढ़ता जा रहा है। मानव में इच्छाएं बहुत बढ़ चुकी है। विकारी गुणों के कारण जीवन जानवरों की तरह बनता जा रहा है। हर तरफ दुख अशांति, निराशा, डर, रोग, अवसाद, चिंताएं आदि अति में होना--- यह सब अंत का संकेत है। ठीक ऐसे समय पर परमात्मा इस धरा पर अवतरण लेते हैं। (वास्तव में परमात्मा वर्ष 1936 में इस धरा पर आ चुके हैं) उनके आने से पहले सृष्टि में धर्म अवश्य था, परंतु अति में नहीं था, इसलिए समय अनुसार परमात्मा ने इब्राहम, महात्मा बुद्ध, ईसा मसीह, गुरु नानक देव आदि धर्म पिताओं को धर्म का प्रचार करने के लिए धरा पर भेजा। इनके माध्यम से दुनिया के बहुत से लोग धर्म के मार्ग पर चलने लगे। धर्म पिताओं ने सृष्टि को पूरी तरह से पतन की ओर जाने से रोक कर रखा।
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लेकिन वर्तमान समय में धर्म की अति हो जाने के कारण परमात्मा को खुद अवतरित होना पड़ता है। 1937 से एक नया दैवी राज्य यानी सतयुग उनके द्वारा स्थापित किया जा रहा है। अनेक अधर्मो का विनाश, एक सत धर्म की स्थापना जैसा कार्य कोई धर्मपिता या साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता। निःसंदेह यह परमपिता परमात्मा शिव का ही कुछ कार्य है।
क्या परमात्मा सर्वव्यापी हैं?
नहीं परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है। वह सर्वज्ञ है। अगर कहीं भी आग है, तो उसके आसपास खड़े लोगों को सेक अवश्य पहुंचता है। इसी प्रकार यदि, परमात्मा सब में होते तो सब में उनके दिव्य गुण रहने चाहिए थे। यदि एक रोगी किसी रोग से पीड़ित होकर, "परमात्मा मेरी रक्षा करो" कह कर प्रार्थना करता है, तो उनके अंदर रह रहे भगवान यह प्रार्थना कर रहे हैं, या वह आत्मा? इसी प्रकार काम विकार के वश होकर यदि कोई मनुष्य किसी स्त्री को दुख देता है, तो उसमें उस समय कौन यह कार्य कर रहा है? क्षणिक आवेश में हत्या करने वाला मनुष्य क्रूर, असुर समान है, या दया के सागर परमात्मा समान। परमात्मा हमारे सबके पिता हैं, सृष्टि की सबसे बड़ी अथॉरिटी है।
वह ठीककर, पत्थर, सर्प, बिच्छू, मगरमच्छ, चोर डाकू सब में कैसे हो सकते हैं। मानना तो दूर यह सोचना भी पाप है।
शिव एवं शंकर में क्या अंतर है?
परमात्मा शिव कल्याणकारी परमधाम निवासी तथा रचयिता है। जबकि महादेव शंकर कलयुगी सृष्टि का संहार करने वाले सूक्ष्म लोक निवासी तथा परमात्मा शिव की रचना है। परमात्मा शिव ज्योति बिंदु स्वरूप है, जबकि शंकर शिव पिता के ध्यान में मगन रहने वाले आकारी देवता हैं। दोनों के कार्य गुप्त व साथ-साथ संपन्न होने के कारण लोग शिव व शंकर को एक ही मान लेते हैं।
भगवान शंकर के रूप का क्या अर्थ है?
शंकर का अर्थ है, तपस्वी स्वरूप उनके केश में रहने वाले चंद्रमा उनकी शीतलता का प्रतीक है, कंठ में सांप माना विकारों रूपी सर्प को गले का हार बना लेना। सर में गंगा बहने का अर्थ, बुद्धि में ज्ञान गंगा का प्रभाव होना। उनके कब्रिस्तान में रहना वैराग्य का प्रतीक है। बाघ की खाल उनकी शक्तिशाली स्थिति दिखती है, तो तीसरा नेत्र उनके ज्ञान रूपी त्रिनेत्र का स्मृति चिन्ह है।




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